संसार (Samsara)
(पहला पद)
गंगा के किनारे मैं चलता हूं,
हवा का स्पर्श, एक भजन सुनता हूं।
ओम का पवित्र ध्वनि मुझे राह दिखाए,
हर दिन शांति में जाग उठूं।
(प्री-कोरस)
मेरे दिल के मंदिरों में,
भक्ति की शाश्वत ज्वाला।
कर्म और धर्म ने दिखाया मुझे,
चक्र जीवन का हिस्सा है।
(कोरस)
संसार, समय और अस्तित्व की नृत्य,
जीवन की धारा में, मैं फिर जन्म लूंगा।
सोने के आसमान के नीचे, मंत्र गूंजे,
आध्यात्मिकता में, मैं प्यार करना सीखूंगा।
(दूसरा पद)
पीपल की छाया में, मैं ध्यान करता हूं,
आवाज़ सुनता हूं, अनंत शाश्वत।
चक्र संतुलित, प्राण बहती है,
शांति में अपना अस्तित्व पाता हूं।
(पुल)
शिव नृत्य करें, सृजन के लिए नष्ट करें,
विष्णु पालन करें, ब्रह्मा रचें।
दिव्य चक्र ने मुझे समझाया,
प्रकाश जो है, दुख से पैदा हुआ।
(कोरस)
संसार, समय और अस्तित्व की नृत्य,
जीवन की धारा में, मैं फिर जन्म लूंगा।
सोने के आसमान के नीचे, मंत्र गूंजे,
आध्यात्मिकता में, मैं प्यार करना सीखूंगा।
(अंत)
जब दिन रात में विलीन हो जाए,
कमल खिलें मेरे दुखों में।
एकता में जागूं, मैं अमर हूं,
आंतरिक खोज में, अंतिम सत्य पाऊं।